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Monday, 18 February 2019

उत्तराखंड का इतिहास (भाग - 1)

               उत्तराखंड का इतिहास
           (History of Uttarakhand)

उत्तराखंड के इतिहास को तीन भागो में बांटा गया है  |

1. प्रागैतिहासिक  काल
2. आधएतिहासिक काल
3. ऐतिहासिक काल ( प्राचीन काल ,  मध्य काल , आधुनिक काल )

प्रागैतिहासिक काल :

प्रागैतिहासिक काल के बारे में जानकारी हमें पाषाण कालीन उपकरण , गुफाओ , शैल चित्रों , कंकाल ,धातु उपकरण आदि से मिलती है | इस काल के कुछ प्रमुख साक्ष्य निम्नलिखित है :

लाखु गुफा –  लाखू गुफा अल्मोरा के बाड़ेछीना में स्थित है इसकी खोज 1963 में की गयी यहाँ  से मानव व पशुओ के चित्र प्राप्त हुए है जिनमे मानव को नृत्य करते दिखाया गया है तथा चित्रों को रंगों से भी सजाया गया है |

ग्वारख्या गुफा – ग्वारख्या गुफा चमोली में अलकनंदा नदी के किनारे डुग्री  गाँव में स्थित है यहाँ से मानव , भेड़ , लोमड़ी , बारहसिंगा के रंगीन चित्र मिले है |

मलारी गाँव – चमोली जिले में स्थित मलारी गाँव से गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सन 2002 में हजारो  वर्ष पुराने नर कंकाल , मिट्टी के बर्तन तथा एक 5.2 किलो का सोने का मुखौटे की खोज की | यहाँ से प्राप्त मिट्टी  के बर्तन पकिस्तान की स्वात घाटी के सिल्प के समान  है |

किमनी गाँव – चमोली जिले में थराली के पास स्थित किमनी गाँव से हथियार व पशुओ के शैल चित्र मिले है

ल्वेथाप – अल्मोड़ा के ल्वेथाप से शैलचित्र प्राप्त हुए है जिनमे मानव को शिकार करते और हाथ में हाथ डालकर नृत्य करते दिखाया गया है |

बनकोट – पिथोरागढ़ के बनकोट से 8  ताम्र  मानव आकृतियाँ मिली है |

फलसीमा – अल्मोड़ा जिले के फलसीमा से योग तथा नृत्य मुद्रा वाली मानव आकृतियाँ मिली है |

हुडली – उत्तरकाशी के हुडली से नीले रंग से रंगर गए शैलचित्र मिले है |

पेटशाल – अल्मोड़ा के पेटशाल  से  कत्थई रंग की मानव आकृतियाँ मिली है |

(2) आधऐतिहासिक काल: –

>> आधऐतिहासिक काल को पौराणिक काल भी कहा जाता है इस काल के बारे में जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथो से मिलती है | इस काल का विस्तार चतुर्थ शताब्दी से ऐतिहासिक काल तक माना जाता है

>>उत्तराखंड का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जिसमे इसे देवभूमि एवं मनीषियों की पुण्य भूमि कहा गया है

>>ऐतरेव ब्राहमण में इस क्षेत्र  लिए उत्तर कुरु शब्द का प्रयोग किया गया है

>>स्कन्दपुराण में 5 हिमालयी खंडो (केदारखंड , मानसखंड , नेपाल , जालंधर तथा कश्मीर ) का उल्लेख है जिनमे से दो केदारखंड (गढ़वाल ) तथा मानसखंड (कुमाऊ ) उत्तराखंड में स्थित है |

>>पुराणों में केदारखंड व मानसखंड के संयुक्त क्षेत्र के लिए  उत्तर-खंड, खसदेश एवं ब्रह्मपुर आदि नामो का प्रयोग किया गया है

>>बौध साहित्य के  पाली भाषा वाले ग्रंथो में उत्तराखंड के लिए हिमवंत शब्द प्रयुक्त किया गया है |

गढ़वाल क्षेत्र-

गढ़वाल को पहले बद्रिकाश्रम क्षेत्र, स्वर्गभूमि , तपोभूमि आदि नामो से जाना जाता था लेकिन बाद में 1515 ई . के आसपास पवार शासक अजयपाल द्वारा यहाँ के 52 गढ़ों को जीत लेने के बाद इसका नाम गढ़वाल हो गया|
ऋग्वेद के अनुसार यहाँ के प्राण नामक गाँव में सप्त ऋषियों  ने प्रलय के बाद अपने प्राणों की रक्षा की|
यहाँ के अल्कापुरी ( कुबेर की राजधानी ) नमक स्थान को आदि पूर्वज मनु का निवास स्थल कहा जाता है |
इस क्षेत्र के बदरीनाथ के पास स्थित गणेश , नारद , मुचकुंद , व्यास एवं स्कन्द आदि गुफाओ में वैदिक ग्रंथो की रचना की गयी थी |
गढ़वाल क्षेत्र के देवप्रयाग के सितोनस्यु पट्टी में सीता जी पृथ्वी में समायी थी इसी कारण यहाँ (मनसार ) में प्रतिवर्ष मेला लगता है |
रामायण कालीन बाणासुर की राजधानी ज्योतिश्पुर ( जोशीमठ ) थी |
पुलिंद रजा सुबाहु की राजधानी श्रीनगर थी |
प्राचीन काल में इस क्षेत्र में कण्वाश्रम व बद्रिकाश्रम नामक दो विद्यापीठ थे कण्वाश्रम दुष्यंत व सकुन्तला के प्रेम प्रसंग के कारण प्रशिद्ध है  इसी आश्रम में सम्राट भरत का जन्म हुआ था जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा |
कण्वाश्रम मालिनी नदी के तट पर स्थित  है महाकवि काली दास ने अभिज्ञान सकुंतलम की रचना कण्वाश्रम में ही की थी वर्तमान में इस स्थान की चौकाघाट कहा जाता है |

कुमाऊँ क्षेत्र-

पौराणिक ग्रंथो के अनुसार चम्पावत के पास में स्थित कान्तेश्वर पर्वत के नाम पर इसका नाम कुमाऊँ पड़ा |
कुमाऊँ का सर्वाधिक उल्लेख स्कंद्पुरण के मानसखंड में मिलता है
ब्रह्म एवं वायु पुराण के अनुसार यहाँ किरात , किन्नर , यक्ष , गन्धर्व , नाग आदि जातियां निवास करती थी , अल्मोड़ा का जाखन देवी मंदिर यक्षो के निवास की पुष्टि करता है |
किरातो के वंशज अस्कोट एवं डोडीहाट नामक स्थान में निवास करते है |
प्रमुख लेख –

देहरादून के कालसी नामक स्थान में अशोक द्वारा 257 ई . पू. में  पाली भाषा में स्थापित अभिलेख है , कालसी अभिलेख में यहाँ के निवासियों के लिए पुलिंद तथा इस क्षेत्र के लिए आपरांत शब्द का प्रयोग किया गया है |
देहरादून के लाखामंडल से राजकुमारी इश्वरा का शिलालेख मिला है

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